Wednesday, March 9, 2016

कुछ कृषि से संबन्धित भारतीय वेब-साईटस


कुछ कृषि से संबन्धित भारतीय वेब-साईटस agriculture related indian websites

Post  Admin on Wed Mar 17, 2010 2:32 am
मैं यहाँ कुछ ऐसी भारतीय साईटस् के नाम एवं पते दे रहा हूँ जो किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है |
ये लिस्ट पूरी नहीं है , इसमे आपके सहयोग की जरूरत भी है अगर आपको कोई और साईट पता हो तो जरूर लिखें |

There are some Agriculture related indian web-sites, which may usefull to the farmers.
You can also add own site here. Or if you know site which is serve the indian farmer then please post here.
Yours most welcome.

http://agricoop.nic.in/ भारतीय कृषि मंत्रालय
http://www.icar.org.in/ Indian Council of Agricultural Research
www.indiaagronet.com India Agriculture market update, India Agriculture news,
www.nabard.org National Bank for Agriculture and Rural Development - NABARD
www.krishiworld.com
www.iari.res.in/ Indian Agricultural Research Institute
www.aofgindia.org/ Agriculture & Organic Farming Group India
www.isapindia.org/
www.pusavarsity.org.in
www.apeda.com/ Search ResultsAgricultural and Processed Food Products Export Development Authority
www.agriculturetoday.in India's premier agriculture magazine
http://www.imd.gov.in/services/agromet/services-to-agriculture-and-farmers.htm
www.agriwatch.com/
www.iasri.res.in/
www.nnsonline.com
www.krishisewa.com/
http://ranars.blogspot.com/
http://khetkhaliyan.blogspot.com/
http://khetkhaliyan.in/
http://kheti-kisani.blogspot.com/
http://hindi.indiawaterportal.org/

जैविक खादें एवं जैविक घोल

जैविक खादें एवं जैविक घोल

Source: 
जलागम प्रबन्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम आध्ययन सामग्री
पाठ-6

वर्मी कम्पोस्ट


केचुएं से बना खादकेचुएं से बना खाद समान्यतः वर्मी यानि केंचुए और उन्हें पालने का ढंग वर्मीकल्चर कहलाता है। ये केंचुए गलने सड़ने वाले सारे बायोमास को प्राकृतिक तरीके से अपना भोजन बनाते हैं, तथा बहुत कीमती बायो कार्बन प्रदान करते हैं। यह पोषक तत्वों से भरपूर अच्छी गुणवत्ता वाली प्राकृतिक खाद है, जो कि सामान्य गोबर खाद से बेहतर होती है और पौधों के बहुमुखी विकास के लिए सहायक होती।

मुख्यतः वर्म पालने वाली किस्में:


1. रैड वर्म (ऐसीनिया फोइटेडा)
2. अफ्रीकन नाइट कॉलर (ऐडिलुइस योजिनाई)
3. इण्डियन अर्थ वर्म (पैरियोनक्स एक्सकवाइटस)

वैसे तो विश्व भर में 3000 किस्म के केंचुए पाए जाते हैं। भारत में अभी तक 350 किस्मों की ही पहचान की गई है। इनमें से रैड वर्म ऐसीनिया फोइटेडा व अफ्रीकन नाइट कालर ऐडिलुइस योजिनाई, वर्मी कम्पोस्ट हेतु उत्तम माने गए हैं। जोकि हर प्रकार के बायोमास को आसानी से पचा लेते हैं और इन्हें 0 से 40 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान तक आसानी से पाला जा सकता है। लेकिन सामान्यतः 20 से 30 डिग्री का तापमान इनके लिए उपयुक्त होता है।

प्रक्रिया:


जैविक खादजैविक खाद जब प्राकृतिक बायोमास केंचुओं के सम्पर्क में आता है, उसी समय प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। केंचुए अधगले बायोमास को बारीक टुकड़ों में काटते हैं तथा अपना भोजन बनाकर आसानी से पचा जाते हैं। उनके द्वारा छोड़ा गया व्यर्थ प्रदार्थ यानि बायोकार्बन उत्पादकता बढ़ाने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं के लिए बायोएनर्जी के रूप में काम आता है। केंचुए एनारोबिक बैक्टिरिया से 20 गुणा ज्यादा/यूनिट बायोकार्बन छोड़ते हैं।

वर्मी कम्पोस्ट के लाभ:


1. यह खाद 45 से 60 दिन में तैयार हो जाती है।
2.यह भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने में सक्षम है। जैसे जलधारण क्षमता।
3. यह उत्पादन के साथ-साथ स्वाद बढ़ाने में भी सक्षम है।
4. यह पौधों के समग्र विकास में सहायक है। इसके साथ यह पौधों की बिमारियों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ाती है।
5. यह रासायनिक खाद का अच्छा विकल्प है।
6. इसकी सहायता से बहुत सारा गलने सड़ने वाले पदार्थ को गुणवत्ता वाले बायोकार्बन में परिवर्तित किया जा सकता है।
7. यह पर्यावरण की स्वच्छता में सहायक होता है।

सामग्री:


1. उपयुक्त स्थान
2. गड्ढा/पिट 10x6x1.5 फुट
3. लगभग 15 से 20 दिन पुराना गोबर 500 कि.ग्रा.
4. लगभग 15 से 20 दिन पुराना बायोमास 1500 कि.ग्रा.
5. पानी आवश्यकतानुसार
6. वर्मी कल्चर 2 कि.ग्रा.

वर्मी कम्पोस्ट बनाने की विधिः


सर्वप्रथम उपयुक्त स्थान का चयन करें जो कि गौशाला/खेत के पास छायादार जगह हो अन्यथा शैड बनाना चाहिए। आप अपनी आवश्यकतानुसार कच्चा/पक्का पिट भी बना सकते हैं। एक सामान्य पिट 10 गुणा 6 गुणा 1.5 फुट का होता है तथा इतना स्थान पहाड़ों में आसानी से मिल जाता है। इस पिट में सतह पक्की होनी चाहिए। कच्चे पिट में प्लास्टिक शीट बिछा दें। इससे केंचुए इसी पिट में रहेंगे।

इसके बाद गड्ढे में भराई की जाती है। इसके लिए सबसे पहले बायोमास की 7 इंच मोटी परत बनाएँ इसके बाद पानी का छिड़काव करें तथा केंचुए इनमें छोड़कर ढ़क दें। अब इसमें नमी बनाए रखने के लिए प्रतिदिन पानी का छिड़काव करते रहें। इसके बाद 30 से 35 दिनों के बाद आप देखेंगे कि गड्ढा/पिट आधा खाली हो गया है। अब इसके उपरी परत को सावधानीपूर्वक पलट दें। इस प्रकार 45 से 60 दिनों में चाय पत्ती की तरह हल्की भूरी गंध रहित खाद बनकर तैयार हो जाती है।

स्तरअनुमानित लागत (रुपयों में)/प्रतिवर्षअनुमानित लाभ (रुपयों में) प्रतिवर्षलागत/लाभ दर
छोटा5200090,0001:1.73
मध्यम1000001,85,0001:1.85
बड़ा2250004500001.2.0



वर्मी वाश


आवश्यक सामग्री
1. एक बड़ा मटका
2. दो छोटे मटके
3. 15 से 20 दिन पुराना गोबर
4. 15 से 20 दिन पुराना बायोमास
5. बारीक बजरी

बनाने की विधिः
केंचुए गोबर को खाद के रूप में परिवर्तित करतेकेंचुए गोबर को खाद के रूप में परिवर्तित करते बड़े मटके की तली में एक छेद करें तथा इसमें बजरी डालें तदुपरान्त बायोमास व गोबर से भरें। इसके बाद वर्मी कल्चर डालें। इसके बाद एक छोटे मटके की तली में छेद करके, बड़े मटके के ऊपर पानी से भर कर रखें। ध्यान रखें कि पानी बूँद-बूँद से बड़े मटके में गिरे। इसके बाद एक बर्तन बड़े मटके के नीचे रखें इसमें वर्मी वाश एकत्र होगा, यह एक सप्ताह बाद निकलना शुरू हो जाएगा। इस एकत्रित जल को किसी भी फसलों पर छिड़काव कर सकते हैं। इसे आप मिट्टी/प्लास्टिक के बर्तन में स्टोर कर सकते हैं तथा 3 माह तक उपयोग कर सकते हैं। दो माह के वर्मी पिट में डाल दें तथा दोबारा उपरोक्त प्रक्रिया अनुसार भरें।

उपयोग:


- इस एकत्रित जल, वर्मी वाश को किसी भी फसल पर 1:10 ली. के अनुपात में मिला कर छिड़काव कर सकते हैं।

लाभ:


- यह तरल खाद, भूमि में आवश्यक सूक्ष्म जीवाणुओं की वृद्धि कर उपजाऊपन बढ़ने में सहायक होते हैं।
- यह फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
- यह फफूँदनाशक है।
- यह फसल में, हरापन बनाए रखने में सहायक होता है। जिससे पौधे ज्यादा भोजन बनाते हैं। व उत्पादन बढ़ता है।

पंचगव्य


आवश्यक सामग्री
गौमूत्र1.5 ली.
गोबर2.5 कि.ग्रा.
दही1 कि.ग्रा.
दूध1 कि.ग्रा.
देशी घी250 ग्राम
गुड़500 ग्राम
सिरका1 ली.
केला6
कच्चा नारियल2
पानी10 लीटर
प्लास्टिक का पात्र1



- पहले दिन 2.5 कि.ग्रा. गोबर, 1.5 ली. गौमूत्र, 250 ग्राम देशी घी अच्छी तरह से मिलाकर बर्तन का ढक्कन बन्द करके रख दें।
- अगले तीन दिन तक इसे रोज लकड़ी से हिलाते रहें।
- अब चौथे दिन सारी सामग्री को आपस में मिलाकर मटके में डाल दें व ढक्कन बंद कर दें।
- अगले 7 दिन तक इसे लकड़ी से हिलाते रहें।
- इसके बाद जब खमीर बन जाय और खुशबू आने लगे तो समझ लें कि पंचगव्य तैयार है।
- इसके विपरीत अगर खटास भरी बदबू आए तो हिलाने की प्रक्रिया एक सप्ताह और बढ़ा दें। इस तरह पंचगव्य तैयार हो जाता है।

पंचगव्य का प्रयोग


- पंचगव्य का प्रयोग, खाद, फसलों की बीमारियों से रोकथाम, कीटनाशक तथा वृद्धिकारक उत्प्रेरक के रूप में किसी भी फसल में कर सकते हैं।
- इसे एक बार बनाकर 6 माह तक प्रयोग किया जा सकता है।

प्रयोग विधिः-


(25 ली. पंचगव्य+750 ली. पानी/एकड़)
एक बीघा में 5 ली. पंचगव्य को 150 ली. पानी में मिलाकर पौधों के तनों के पास छिड़काव करें।
- पौधारोपण या बुवाई के पश्चात 15-30 दिन के अन्तराल पर 3 बार लगातार प्रयोग किया जा सकता है।

सावधानियाँ


- हमेशा प्लास्टिक के बर्तन में ही बनाए।
- पंचगव्य का प्रयोग करते समय, खेत में नमी का होना आवश्यक है।
- पंचगव्य का छिड़काव सुबह या शाम के समय ही करना चाहिए।
- पंचगव्य के साथ किसी प्रकार रासायनिक खाद कीटनाशक या खरपतवार नाशक का प्रयोग नहीं करना चाहिये।

पंचगव्य की विशेषतायें:-


- इसके प्रयोग से भूमि में जीवांशों (सूक्ष्म जीवाणुओं) की संख्या में वृद्धि होती है।
- भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
- फसल के उत्पादन एवं उसकी गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
- भूमि में नमी एवं हवा के आवागमन को बनाये रखता है।
- यह स्थानीय संसाधनों पर आधारित है।
- यह सरल व सस्ती तकनीक पर आधारित है।

अमृत घोल


आवश्यक सामग्री
गौमूत्र1 ली.
गोबर1 कि.ग्रा.
मक्खन2.50 ग्रा.
गुड़500 ग्राम
शहद500 ग्राम
पानी10 लीटर
प्लास्टिक का पात्र1



बनाने की विधि


- इस सभी सामग्री को मिलाकर प्लास्टिक के पात्र में भरकर 7 से 10 दिन तक छायादार स्थान पर रख दें।
- प्रति दिन सुबह शाम लकड़ी से घोल को हिलाते रहें।

उपयोग:-


एक बीघा में 16 ली. अमृत घोल तथा 160 ली. पानी मिलाकर किसी भी फसल में प्रयोग किया जा सकता है।

मटका खाद


आवश्यक सामग्री
गाय का ताजा गोबर15 कि.ग्रा.
गौमूत्र15 ली.
गुड़2.50 ग्राम
पानी15 लीटर
प्लास्टिक पात्र या मटका1



बनाने की विधि


- सर्वप्रथम 15 ली. पानी में 250 ग्राम गुड़ का घोल तैयार करें।
- मटके में 15 ली. गौमूत्र 15 कि.ग्रा. 250 ग्राम गुड़ का घोल डालें और लकड़ी की सहायता से अच्छी तरह मिला दें।
- इसके बाद पात्र का ढक्कन बन्द कर दें तथा 7-10 दिन तक छायादार स्थान पर रख दें।

उपयोग विधि:-


- एक बिघा खेत में 30 ली. मटका खाद 150 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
- इसे किसी भी फसल में प्रयोग किया जा सकता है।
- अनाज की बाकी फसलों की बुवाई के 25 से 45 तथा 70 दिन बाद, तीन बार प्रयोग किया जा सकता है।

फसल रक्षक घोल


फसलों को बीमारियों से बचाने के लिए यह एक घरेलू व प्राकृतिक विधि है। जिसमें घर की रसोई, गौशाला, आस-पास पाई जाने वाली वनस्पतियाँ उपयोग की जाती है।

आवश्यक सामग्री


गौमूत्र1 ली.
नीम की खली250 ग्राम
नीम की पत्तियाँ250 ग्राम
तम्बाकू के पत्ते250 ग्राम
लहसुन100 ग्राम
लाल मिर्च100 ग्राम



इसके अतिरिक्त आस-पास पाई जाने वाली कड़वी वनस्पतियाँ (जिन्हें बकरी नहीं खाती) का उपयोग, फसल रक्षक घोल बनाने में किया जा सकता है।

बनाने की विधि:-


इसके लिए कम से कम 1 ली. गौमूत्र की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त कम से कम तीन वानस्पतियाँ जो उपलब्ध हों एक-एक कि. ग्रा. की बराबर मात्रा में पीस कर, लाल मिर्च व लहसुन का पेस्ट, गौमूत्र के साथ मिला कर सारी सामग्री को एक मिट्टी/प्लास्टिक के बर्तन में 10 ली. पानी में घोलकर 7 दिन तक ढक कर रखें। आपातकाल में इसका उपयोग 48 घंटे बाद किया जा सकता है।

भण्डारण क्षमताः


इसे छानकर मिट्टी, प्लास्टिक, काँच के बर्तन में 4-6 माह तक रख सकते हैं।

उपयोग:-


- फसल रक्षक घोल को 1:10 ली. पानी में मिलाकर दूसरी व तीसरी निड़ाई-गुड़ाई के बाद छिड़काव करना चाहिए।
- सब्जियों में इसे 15 दिन के अन्तराल में छिड़काव करना चाहिए।

लाभ:-


- यह फसल, की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
- यह कीटनाशक के रूप में उपयोग किया जाता है।

सामान्य कम्पोस्ट


कम्पोस्ट बनाने की विधि:-
इस प्रकार की कम्पोस्ट बनाने के लिये निम्न सामग्री की आवश्यकता होती हैः-

- पेड़ों की सूखी टहनियाँ तथा अन्य बेकार पड़ी सूखी लकड़ियाँ।
- सूखे पत्ते
- हरी पत्तियाँ, घास फूस इत्यादि।
- गोबर (यदि गाय का गोबर हो तो अच्छा रहता है)
- बाँस

सबसे पहले जमीन से 10 से 12 इंच ऊँचाई तक पेड़ों की सूखी टहनियाँ, इस प्रकार की जमीन पर बिछाई जाये जहाँ पर उपयुक्त छाँव हो तथा जमीन बराबर हो कम्पोस्ट पिट की चौड़ाई इस प्रकार रखी जानी चाहिए, कि दोनों हाथों से सतहों को छुआ जा सके। पेड़ों की सूखी टहनियाँ बिछाने के बाद उस पर गोबर के पतले घोल का इस प्रकार से छिड़काव किया जाये, कि टहनियाँ बराबर गीली हो जायें। इसके पश्चात टहनियों पर तालाब की मिट्टी की एक पतली परत टहनियों पर डाल देते हैं। पिट के बीचों-बीच 1.5 से.मी. ऊँचाई का बाँस का डंडा खड़ा कर देते हैं।

इसके पश्चात हरी पत्तियाँ, घास फूस इत्यादि 15 से 20 इंच तक की ऊँचाई तक बिछा देते हैं तथा इस पर भी गोबर का पतला घोल छिड़क देते हैं। इसके ऊपर इतनी ऊँचाई तक सूखी पत्तियाँ बिछाकर, इस पर गोबर का पतला घोल छिड़क कर तालाब की मिट्टी डालते हैं।

यही प्रक्रिया इसी क्रम में बार बार करते हैं जब तक कि ढेर की ऊँचाई 1 से 2 मी. तक न हो जाए, फिर नीचे से 5 से 10 इंच छोड़कर पूरे ढ़ेर में गोबर का पतला लेप लगा देते हैं।

एक माह पश्चात ढ़ेर की गुड़ाई करके, ढेर पुनः इकट्ठा करके, उस पर गोबर का लेप लगाकर छोड़ देते हैं। बांस को रोजाना थोड़ा हिलाते, डुलाते रहते हैं, तथा ध्यान रखते हैं, कि ढेर में नमी बनी रहे। 1.5 से 2 माह पश्चात।

जैविक खादों की विशेषतायें:-


इनके प्रयोग से भूमि में, जीवांशों (सूक्ष्म जीवाणुओं) की संख्या में वृद्धि होती है।

1. भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
2. फसल के उत्पादन एवं उसकी गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
3. भूमि में नमी एवं हवा के आवागमन को बनाये रखती है।
4. फसल में रोग एवं कीटों के प्रभाव को कम करती हैं।
5. यह स्थानीय संसाधानों पर आधारित है।
6. यह सरल व सस्ती तकनीक पर आधारित है

कोसी की बाढ़

कोसी की बाढ़

Source: 
पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती पुस्तक से साभार, प्रथम संस्करण 2011
अगले दिन भी सुबह से अलग-अलग इलाकों में गए। दोपहर में सभा हुई। बेलदौर से तीन बजे बस से प्रस्थान करके मानसी तक आए। मानसी से रेल पकड़ी। यह इलाक़ा खगड़िया जिले में पड़ता है। आगे हम रोसेरा में उतरे। वहां पर शुभ्रमुर्ती जी को मिले। समस्तीपुर होते हुए अगली सुबह संगोली पहुंचे। अगले दो दिनों में गंडक नदी द्वारा स्थान-स्थान पर हो रहे कटान को देखा। फिर मुज़फ़्फ़रपुर होते हुए पटना लौटे। जगह-जगह नदी को बांधने का प्रयास किया गया है। जिसे नदी ने बार-बार तोड़ा और बांधने के प्रयास को असफल कर दिया। उत्तराखंड से उद्गमित गंगा की अनेक धाराओं की बौखलाहट की तो हम थोड़ी बहुत जानकारी रखते हैं। समय-समय पर यहां के लोग इनकी बौखलाहट की मार सहते रहते हैं। गंगा जब मैदानों में प्रवेश करती हैं तो वहां उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाता है तथा गंगा के द्वारा वहां की धरती में किस प्रकार का कहर बरता जाता है यह समझने के लिए हमने सारनाथ, वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, छपरा और पटना तक पैदल यात्रा भी की। लेकिन इसके आगे गंगा एवं उसकी सहायक धाराओं को न देखा था, न समझा ही था। बरसात के मौसम में कभी-कभार बाढ़ के समाचार पढ़ने को मिलते। बिहार की त्रासदी की कहानियां भी पढ़ने को मिलती। कभी-कभार गंगा की बाढ़ के बारे में श्री अनिल प्रकाश या श्री दिनेश कुमार के पत्र भी प्राप्त होते रहते। समय-समय पर शांतिमय समाज तथा वरिष्ठ गांधीवादी कार्यकर्ता श्री कुमार कलानंद मणि से मिलना होता तो गंगा की धाराओं द्वारा बिहार में प्रति वर्ष होने वाली त्रासदी की गाथा सुनने को मिलती।

इसी क्रम में वर्ष 1998 में कलानंद जी के साथ उत्तरी बिहार से प्रवाहित नदियों की यात्रा करने का अवसर प्राप्त हुआ था। यह आयोजन शांतिमय समाज गोवा का सतत चलने वाला कार्यक्रम था। अप्रैल के प्रथम सप्ताह में कलानंद जी के साथ मैंने पटना से प्रस्थान किया। अगले दिन बेलदौर में शांतिमय समाज से जुड़े कार्यकर्ताओं की बाढ़ के संबंध में आयोजित बैठक में भाग लिया। यह कोसी की बाढ़ से प्रभावित अंतरवर्ती क्षेत्र है। पिछली बाढ़ की त्रासदी एवं सरकार की भूमिका पर खुलकर चर्चा हुई, जिसमें मुझको बाढ़ से होने वाले कहर की एक झलक समझने को मिली। यहां पर स्थानीय कार्यकर्ताओं में ग़जब का उत्साह देखने को मिला। यह सब कलानंद जी की संगठन शक्ति एवं रचनात्मक दृष्टि का परिचायक था। प्रभावित क्षेत्र को देखने के बाद रात को वहीं ठहरे।

यह क्षेत्र कोसी नदी का प्रभाव क्षेत्र है। अगले दिन भी सुबह से अलग-अलग इलाकों में गए। दोपहर में सभा हुई। बेलदौर से तीन बजे बस से प्रस्थान करके मानसी तक आए। मानसी से रेल पकड़ी। यह इलाक़ा खगड़िया जिले में पड़ता है। आगे हम रोसेरा में उतरे। वहां पर शुभ्रमुर्ती जी को मिले। समस्तीपुर होते हुए अगली सुबह संगोली पहुंचे। अगले दो दिनों में गंडक नदी द्वारा स्थान-स्थान पर हो रहे कटान को देखा। फिर मुज़फ़्फ़रपुर होते हुए पटना लौटे। जगह-जगह नदी को बांधने का प्रयास किया गया है। जिसे नदी ने बार-बार तोड़ा और बांधने के प्रयास को असफल कर दिया।

कोसी नदी की अनेक धाराएं नेपाल से निकलती हैं। उनको देखने और समझने का अवसर तो अभी तक नहीं मिला, लेकिन उसके द्वारा जो सिल्ट भारत की इन नदियों में आती है, उससे साफ पता चलता है कि इनके फैलाव वाले बेसिन की स्थिति ठीक नहीं है। इसका दुष्प्रभाव तो हर वर्ष ही बिहार के उत्तर से बहने वाली गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी आदि नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र में बसने वाले ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है।

लेकिन वर्ष 2008 में कोसी नदी ने भयंकर तबाही मचाई थी। इसी क्रम में शांतिमय समाज ने कोसी बचाओ अभियान के अंतर्गत तत्काल प्रभावित इलाकों में पहुंच कर लोगों का मनोबल बढ़ाने एवं सेवा का कार्य प्रारंभ कर दिया था।

लेकिन नवंबर दूसरे सप्ताह के प्रारंभ में ‘कोसी बचाओ अभियान’ के अंतर्गत वहां की जनता के साथ संवाद यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें कलानंद जी ने मुझे भी भाग लेने का अवसर दिया। हम लोग 7 नवंबर की सुबह बक्सर-दानापुर पहुंच गए थे। वहां से रेल धीमी गति से आगे बढ़ रही थी। जहां जिसकी मर्जी थी वह जंजीर खींचकर रेल रोक देता था। आगे हमें मोकामा से खगड़िया, जो कि 70 किलोमीटर दूर है, जाने में तीन घंटे लगे। खगड़िया से गंगा लगभग सात किलोमीटर दूर बहती है। इसके आस-पास ही कोसी भी गंगा में समाहित होती है। हम खगड़िया में स्थानीय लोगों से मिले। यहां से हमारे साथ भारतीय नदी घाटी मंच एवं शांतिमय समाज के कई कार्यकर्ता भी हो गए थे। खगड़िया में पत्रकार भी मिलने आए। उनसे इस भीषण त्रासदी के बारे में कई प्रकार की जानकारी प्राप्त हुई।

खगड़िया से दोपहर को हमने सहरसा के लिए प्रस्थान किया। सहरसा यहां से 90 किलोमीटर दूर है। रास्ते में जगह-जगह लोगों ने बाढ़ की त्रासदी के बारे में जानकारी दी कि उनका भविष्य भी खतरे में है। खेत पानी में डूबे हैं, कब तक पानी का निकास हो सकेगा, यही चिंता सता रही है।

सहरसा से हमने सुबह ही प्रस्थान कर दिया था। रास्ते में जीपों एवं बसों में क्षमता से दुगने-तिगुने लोग भरे थे। ये वाहन इसके बावजूद भी सरपट से दौड़ रहे थे। आगे हम बैजनाथपुर चौक पर रुके। वहां पर हमने नाश्ता किया और आस-पास के स्थानों के चित्र ले रहे थे, कि पुलिस वाला आ धमका कि फोटो नहीं ले सकते हो। तुम्हें साहब बुला रहा है। हमने कह दिया कि साहब को कहो कि तुम्हें यहां बुला रहे हैं। इस सबको देख कर लगा कि किस प्रकार इस अंतरवर्ती क्षेत्र में पुलिस की मनमानी है। इधर आस-पास के गांवों में भी बाढ़ आई थी। लोग अभी तक नहीं उबर पाए हैं। इसके बाद हम 10 बजे तक राधवपुर पहुंचे। राधवपुर के पास सिमराही बाजार में लोगों का तांता लगा हुआ था।

11 बजे से सिमराही बाजार के पास एक मैदान में सभा हुई, जिसमें दूर-दूर से लोग आए थे। अधिकांश लोग बाढ़ प्रभावित इलाके से आए थे, जिसमें महिलाएं अधिक थी। अधिकांश लोग जिनके बदन में ठीक से कपड़े भी नहीं थे, उदास चेहरों के माथों पर चिंता की लकीरें साफ पढ़ी जा सकती थी। धूल भरे आंचल में कईयों ने छोटे बच्चे भी गोद में लिए हुए थे। दो तरफ दीवार से घिरा मैदान लोगों से खचा-खच भरा था। एक अनुमान के अनुसार आठ हजार से ज्यादा लोग सभा में थे।

वाक्य घोषों से सभा का शुभारंभ हुआ। फिर सरकारी लापरवाही, जिससे बांध टूटा, पर व्याख्यान हुए। इस प्रकार दो घंटे तक सभा हुई। सभा के अंत में एक कोने पर कुछ लोग खड़े होकर जोर से बोलने लगे। पता चला कि कुछ लोग चाहते हैं कि बांध जहां से टूटा है और नदी आजकल बह रही है, उसे ही रहने दिया जाए। कुछ पुराने स्थान, जहां से पहले नदी बहती थी उसे ही चाहते हैं। इस प्रकार से हमारे यहां गढ़वाल में एक कहावत है कि “ऐ बाघ मी न खा, येते खा” याने हे बाघ मुझे मत खाओ, इसको खाओ। लेकिन क्या कोई रास्ता है कि बांध में किसी को खाने की हिम्मत ही न हो। बांध और बाढ़ यहां एक दूसरे के पूरक हैं। बांध और बाढ़ से मुक्ति कैसे मिले इसी के लिए इस सभा का आयोजन किया गया था। यह बात अलग है कि इस सभा का इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कितना प्रभाव पड़ पायेगा। लेकिन शांतिमय समाज द्वारा ‘कोसी बचाओ अभियान’ के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एकत्रित होना कार्यकर्ताओं की क्षमता का प्रदर्शन था। वहीं आमजन, जिसे राजनीति से लेना देना नहीं है, बाढ़ से छुटकारे का रास्ता तलाशना चाहता था। इसके बाद कोसी बचाओ अभियान की भी मीटिंग हुई, जिसमें अलग-अलग इलाकों से आए हुए प्रतिनिधियों ने समस्याओं एवं भावी कार्यक्रम के बारे में चर्चा की।

कोसी की सहायक धारा अरूण नदी एवरेस्ट के उत्तर से उद्गमित होती है। इसी प्रकार दूध कोसी, सून कोसी, ताम कोसी आदि इसकी सहायक धाराएं हैं। ये सभी नदियां लंबी यात्रा कर कोसी में समाहित होकर भारत में प्रवेश करती हैं। इसके ऊपरी जल ग्रहण क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई जारी है, तथा कमजोर पहाड़ों में भूक्षरण और भूस्खलन प्रक्रिया दिनों दिन बढ़ती जा रही है। साद को रोकने, कम करने का कोई मुकम्मल प्रबंधन नहीं किया गया है। इसमें अंतरराष्ट्रीय मुद्दे तो हैं लेकिन अपने भूभाग में भी साद के समुचित प्रबंधन के प्रति लापरवाही तो है ही
इसी बीच कई भुक्तभोगियों से बातचीत करने का अवसर मिला। सिमराही में कपिल देव का पूरा परिवार गांव छोड़ कर आया है। रोष भरे लहज़े में कहता है कि बाढ़ आई नहीं, लाई गई है। बताता है कि जब बाढ़ लाई गई तो गांव में जो कुछ माल असबाब था सब छोड़कर आए हैं। यदि वहीं रहते तो और परिवारों की तरह जान से हाथ धोना पड़ता। हम तो जान बचाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। इधर आने जाने के रास्ते भी नष्ट हो गए हैं। गाँवों में इतने दिन बाद भी राशन नहीं पहुंच रहा है। गरीब और मध्यम तबके के लोग ज्यादा परेशान हैं। अभी तक पड़ोसी गांव के लोगों की कृपा पर जी रहे हैं।

इसी प्रकार देवेंद्र जी कहते हैं कि लगभग आधे गाँवों में अभी भी पानी भरा है। इस कारण पलायन भी हुआ है। अगली फसल के लिए भी खेत तैयार नहीं हैं। इसलिए आगे भी अंधेरा ही दिख रहा है। ऐसे में अकाल की स्थिति पैदा हो गई है।

अगले दिन सुबह-सुबह हमने राघवपुर से कोसी बैराज की ओर प्रस्थान किया। इसमें कलानंद जी के अलावा प्रो. प्रकाश जी भारतीय नदी घाटी मंच के राष्ट्रीय समन्वयक है। श्री भगवान जी पाठक तथा दर्जनों कार्यकर्ता तथा पत्रकार भी साथ थे। सिमराही से भीमनगर 40 किलोमीटर दूर है। यहां तक बिहार का सुपोल जिला है। इसके आगे नेपाल का सप्तहरी इलाक़ा पड़ता है। यहां सीमा पर नेपाली प्रहरी मिले।

भीमनगर में कोसी बैराज है। यहीं पर शांतिमय समाज ने संकल्प का आयोजन किया। कलानंद जी ने संकल्प करवाया, जिसे हम सबने दोहराया तथा संक्षिप्त संबोधन के बाद बांध के किनारे यात्रा की। यहां से कुछ दूर पर एक सभा के बाद घनश्याम जुड़ांव जी के नेतृत्व में पद यात्रा भी निकाली गई।

इस प्रकार इस यात्रा के क्रम में खगड़िया से कोसी बैराज तक सभाओं एवं गोष्ठियों के माध्यम से हजारों बाढ़ पीड़ितों से साक्षात्कार हुआ और विनाश को प्रत्यक्ष देखा। रास्ते में नहरों, कोसी नदी एवं बैराज में चारों तरफ साद ही साद देखा गया। इसके कारण नदी, नहर और बैराज की जल धारण एवं जल प्रवाह प्रणाली में भारी व्यवधान हो गया। ऊपर से बांध के कमजोर भाग ने धारा परिवर्तन करने एवं प्रलयंकारी बाढ़ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। मुख्य नदी एवं नहरों में पानी नहीं है बल्कि गांव, खेत, चरागाह और मैदान पानी से भरे पड़े देखे गए।

बताते हैं कि कोसी बांध का पूर्वी किनारा टूटा, जिसके कारण कोसी नदी की धारा 35 किलोमीटर दूर परिवर्तन हुई। जिससे चार जिले पूरी तरह तथा तीन जिले आंशिक रूप से प्रभावित हुए। लोग बता रहे थे कि वर्षों पहले कोसी यहीं से प्रवाहित होती थी। इस वर्ष की प्रलयंकारी बाढ़ 20 से 25 लाख की आबादी प्रभावित हुई। भीमनगर के पास जहां कोसी बैराज है, उसके गेटों में आधा सिल्ट जमा थी। बांध भी साद से लबालब भरा था।

कोसी की सहायक धारा अरूण नदी एवरेस्ट के उत्तर से उद्गमित होती है। इसी प्रकार दूध कोसी, सून कोसी, ताम कोसी आदि इसकी सहायक धाराएं हैं। ये सभी नदियां लंबी यात्रा कर कोसी में समाहित होकर भारत में प्रवेश करती हैं। इसके ऊपरी जल ग्रहण क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई जारी है, तथा कमजोर पहाड़ों में भूक्षरण और भूस्खलन प्रक्रिया दिनों दिन बढ़ती जा रही है। साद को रोकने, कम करने का कोई मुकम्मल प्रबंधन नहीं किया गया है। इसमें अंतरराष्ट्रीय मुद्दे तो हैं लेकिन अपने भूभाग में भी साद के समुचित प्रबंधन के प्रति लापरवाही तो है ही। हमारे देश में सन् 1950 के अरुणाचल प्रदेश के 8.7 रिएक्टर के भूकंप के बाद ब्रह्मपुत्र नदी सबसे ज्यादा साद बहाने वाली नदी थी। पर अब लगता है कि कोसी नदी इस बारे में ब्रह्मपुत्र को भी पीछे छोड़ देगी। यदि प्रतिवर्ष आने वाली साद की मात्रा को अति प्राथमिकता के आधार पर रोकने या कम करने के व्यावहारिक कार्यक्रम नहीं बनते तो आगे भी इसके भयंकरतम दुष्परिणाम भोगने पड़ेंगे।

इस यात्रा के बाद भारतीय नदी घाटी मंच ने कुछ मुद्दे इस प्रकार प्रस्तुत किए थे।
यद्यपि तटबंध बाढ़ सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनाए गए हैं, लेकिन वे इस काम में असफल सिद्ध हुए हैं। बार-बार कोसी की त्रासदी को झेलते-झेलते आम जनता का मनोबल एवं आत्मविश्वास टूट चुका है। आज सबसे ज्यादा जरूरी है जनता के आत्मविश्वास को बहाल करना एवं उसके मनोबल को उठाना ताकि उनका पुरुषार्थ जागृत हो सके।

पुनर्वास के कार्यक्रमों में प्रभावित लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि वे राहत पाने की मारी-मारी की मानसिकता से मुक्त होकर अपने पुरुषार्थ का उपयोग कर सकें।

लगभग पूरा उत्तर बिहार विभिन्न नदियों की बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र है, किंतु बाढ़ प्रबंधन की दृष्टि नहीं है। इन क्षेत्रों में क्लस्टर आधारित बाढ़ के उच्चतम स्तर को ध्यान में रखकर स्थायी आश्रय स्थलों का विकास होना चाहिए। यहां खाद्य सामग्री, जीवन रक्षक दवाइयों एवं उपकरणों, मवेशियों के लिए चारे का भंडार होना चाहिए। बाढ़ के बाद इन आश्रय स्थलों का सामुदायिक उपयोग हो सकता है।

हमें रेडियों प्रणाली की स्थापना एवं उसके संचालन का प्रशिक्षण दिया जाए ताकि सूचनाओं का त्वरित गति से आदान-प्रदान हो सके।

बाढ़ के प्रभाव को कम करने की दृष्टि से देशज परंपरा एवं आधुनिक तकनीक का अध्ययन करते हुए बाढ़ सहजीवन की दृष्टि का विकास होना चाहिए।

बिहार संसाधनों से गरीब नहीं है। इसके पास सबसे उपजाऊ ज़मीन, प्रचुर जल संसाधन एवं बड़ी जनसंख्या है। गरीबी तो मानसिकता में है। दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर इन संसाधनों का सटीक एवं समंवित उपयोग करते हुए बिहार को देश का सबसे समृद्ध क्षेत्र बनाया जा सकता है।

भारत और नेपाल समान नदी प्रणाली से जुड़े हैं। अतः इन नदियों के संरक्षण, संवर्द्धन में दोनों देशों का समान योगदान होना चाहिए। तभी दोनों देश बाढ़ एवं वैश्विक तापमान की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

बिहार की बाढ़

बिहार की बाढ़

दीपक भारतीदीपक भारतीबाढ़ से पूर्ण मुक्ति के लिये ''नदी मुक्ति आंदोलन'' शुरु किया है, परंतु राजनेता व तटबंध ठेकेदारों द्वारा निरंतर रोढ़े डाले जाने की वजह से यह बहुत अधिक सफल नहीं हो पाया है। नदी मुक्ति आंदोलन सभी तटबंधों को हटाने व नदी को 1954 पूर्व की अवस्था पर लाने की माँग करता है। हम शोधकर्ता, नीति निर्माता व सरकार को इस मुद्दे से अवगत कराते हैं और आम जनता को शिक्षित करते हैं कि तटबंध बाढ़ समस्या का समाधान नहीं, असली समाधान नदी को तटबंध से मुक्त करने में है – ये शब्द हैं दीपक भारती के।

- दीपक भारती 1974 के छात्र आंदोलन से निकले हैं, जो देश के अनेक हिस्सों में फैल गया था व इंदिरा गाँधी द्वारा इमरजेंसी लगाये जाने की एक वजह भी बना था। आश्चर्य नहीं कि जयप्रकाश नारायण के अनुयायी दीपक भारती नितांत खरे व्यक्ति हैं। वे बिहार की बाढ़ पर अपनी पैनी अंतर्दृष्टि व व्यावहारिक समझ से प्रकाश डालते हैं, व बताते हैं कि तटबंध निर्माण बिहार बाढ़ का सबसे बड़ा कारण है। इसके बावजूद राजनेता-ठेकेदार गठबंधन की वजह से तटबंध निर्माण जारी है। बाढ़ संबंधी हरेक मसले पर दीपक के बड़े ही निर्भीक विचार हैं। दीपक भारती अपनी संस्था एसएसवीके यानी सामाजिक शैक्षणिक विकास केंद्र’ देश के साथ अत्यंत गरीब राज्य बिहार में हाशियाग्रस्त व उपेक्षित लोगों, खासकर महिलाओं के उत्थान व सशक्तीकरण हेतु कार्यरत है।

बिहार में बाढ़ के लिहाज से 1954, 1974 व 2004 बहुत भयावह वर्ष रहे हैं। वर्तमान साल इन सबसे अधिक तबाहीकारक सिध्द हो सकता है। बिहार में बाढ़ आने की आखिर क्या वजह है? 1954 से पहले जब तक नदियों को तटबंध में नहीं बाँधा गया था, पानी को बहने के लिये काफी खुली जगह मिलती थी, पानी कितना भी तेज हो जन-धन हानि बहुत अधिक नहीं होती थी। 1954 से पहले नदियॉ खुली जगह में धीमे प्रवाह से बहतीं थीं। मध्दिम प्रवाह उर्वरा मिट्टी के बहाव में मदद करता था व आसपास के इलाके उर्वर हो जाते थे। परंतु तटबंध से नदियों को बाँधने के बाद जल भराव व बाढ़ से तबाही होना शुरु हो गया। बिहार की बाढ़ का मुख्य कारण तटबंध हैं। तटबंध बाढ़ को नियंत्रित करने व सिंचाई को बढ़ावा देने के लिये हैं परंतु इनसे बाढ़ रुक नहीं पाती है बल्कि तटबंध टूटने से बालू बहुत तेज बहती आती है, आसपास की उर्वरा भूमि बंजर हो जाती है। तटबंध निर्माण से ठेकेदारी व भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है। कई सारे ठेकेदार विधायक व मंत्री बन गये हैं। बाढ़ नियंत्रण व सिंचाई के नाम पर यह तटबंध राजनीति की देन है। तटबंध बाढ़ से सुरक्षा के बजाय बाढ़ की विभीषिका में वृध्दि करते हैं। अगर आप आंकड़े देखें, जैसे-जैसे तटबंध बनते गये हैं, बाढ़ में तेजी आयी है।

2007 बाढ़ क़े प्रमुख कारण क्या हैं?

बिहार व नेपाल में लगातार वर्षा, वैश्विक तापमान वृद्धि, जल निकासी व्यवस्था के बिना गाँव में सड़क निर्माण, आपदा प्रबंधन विभाग की उदासीनता व राज्य सरकार की उपेक्षा से इस वर्ष की बाढ़ भीषण होती गई है। 19 जिले एक रात में नहीं डूब सकते थे। बाढ़ का पानी धीमे-धीमे फैला था, परंतु प्रशासन जिला व राज्य मुख्यालयों के वातानुकूलित कमरों में सोया हुआ था। बाढ़ प्रभावित इलाकों में दौरे के दौरान मैं कई पत्रकार मित्रों के संपर्क में आया मसलन प्रणव कुमार चौधरी, विशेष संवाददाता “टाइम्स ऑफ इंडिया” पटना व अभय मोहन झा संवाददाता एनडीटीवी, जो सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित दरभंगा जिले में थे। उन्होंने भी माना कि स्थानीय प्रशासन कुछ नहीं कर रहा है। विडंबना है कि अब तक पुलिस दो बाढ़ पीढ़ित व्यक्तियों को नृशंसतापूर्वक मार चुकी है।

आपने 2004 में इनसाइड बिहार एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उसके मुख्य बिंदुओं के बारे में बतायें।

वह रिपोर्ट यही कहती है कि तटबंध व बड़े बाँध बिहार की बाढ़ के समाधान नहीं हैं। दवा ऐसी हो जो रोग घटाये, जबकि 1954 के बाद के आंकड़े बताते हैं कि तटबंध के बनने से बाढ़ अनियंत्रित होती गयी है। यह रिपोर्ट पूरे विस्तार में,प्रामाणिक ऑंकड़ों के साथ तटबंधों की निरर्थकता सिद्ध करती है।

ये तो रही समस्या। आपके अनुसार इसका क्या समाधान होना चाहिये? बिहार की नदियों पर बड़े बाँध बनने की बात भी है। इन दिनों नुंथार, शीशपनी व बराह में नेपाल से निकलने वाली कोसी, बागमती व कमला इत्यादि नदियों पर बड़े बाँध बनाने की बात चल रही है। कहा जाता है कि इससे बाढ़ नियंत्रित होगी, सिंचाई बढ़ेगी व बिजली का उत्पादन होगा। परंतु चीन समेत कई देशों के उदाहरण हैं कि भूकंप में बड़े बाँधों के फटने से भीषण तबाही होती है। अगर आप 1988 के बिहार भूकंप व 2001 के गुजरात भूकंप की तुलना करें तो पायेंगे कि भले ही ये दोनों भूकंप पैमाने पर लगभग बराबर थे, परंतु बिहार में नुकसान बहुत कम हुआ क्योंकि गरीबी बहुत अधिक होने यहाँ झोंपड़ियाँ अधिक हैं, पक्के मकान कम हैं, नुकसान की संभावना कम है। उत्तरी बिहार भूकंप संभावित इलाका है, बड़े बाँध के बनने से कई खतरे हो सकते हैं।

1998 में दरभंगा में झटके आये थे, जो बड़े बाँध के प्रस्तावित स्थल से महज 60 किलोमीटर दूर है। 1988 के मधुबनी भूकंप में कमला नदी का तटबंध टूट गया था। पर्यावरणविदों का मानना है कि भूकंप के बाद अगर बाँध चरमराता है व फूटता है तो पूरा उत्तरी बिहार बह जायेगा, कुछ नहीं बचेगा। दूसरे, भूमंडलीकरण के दौर में किस देश का संबंध कब दूसरे देश से बिगड़ जायेगा कहना मुश्किल है। दरभंगा में चीन को ध्यान में रखकर हवाईअड्डा बनाया गया है। अगर कल चीन के साथ हमारे संबंध गड़बड़ाते हैं और चीन इस बाँध पर बमबारी करता है तो पूरा इलाका बह जायेगा। दूसरे, नेपाल में माओवादी सत्ता में हैं। बिहार में भी कई सारे इलाके नक्सली हिंसा से प्रभावित हैं। बड़े बाँध नक्सलवादियों के हमेशा निशाने पर रहेगें व जरा से हमले से भीषण तबाही आ जायेगी। इसलिये बड़े बाँधों के बजाय लघु बाँध बनने चाहिये। छोटे बाँधों से सिंचाई बढ़ेगी, बिजली उत्पादन भी होगा व बाढ़ बचाव भी होगा। परंतु राजनैतिक नेताओं में बाढ़ व बाँध संबंधी समझ नहीं है व इस विषय पर चर्चा का भी अभाव है।

इस साल की बाढ़ व तबाही पिछले वर्षों की तुलना में किस तरह अधिक है? सरकारी आंकड़े क़ुछ कहते हैं, मीडिया कुछ और। आपके अनुसार जन-धन हानि कितनी है? कितने जिले बाढ़ प्रभावित हैं? सरकारी आंकड़ों के अनुसार 19 जिलों के 175 प्रखंड, 1958 पंचायत, 7302 गाँव व एक करोड़ चौवालीस लाख लोग प्रभावित हुये हैं व 217 मनुष्य और 108 पशुओं कालग्रसित हुये हैं। 10023.37 लाख के अनुमानित मूल्य के 133050 घर तबाह हो गये हैं। 26618.89 लाख मूल्य की फसल प्रभावित हुयी है। परंतु गैर सरकारी सूत्र असल नुकसान को सरकारी आंकड़ों से चार गुना अधिक बताते हैं। 1000 से अधिक व्यक्तियों के मारे जाने की खबर है। सरकार के अनुसार दरभंगा जिले में 51 लोग मरे हैं जबकि हिंदुस्तान दैनिक के दरभंगा संवाददाता सतीश ने दरभंगा में कुल 100 लोगों के मारे जाने की खबर दी है। समस्तीपुर में नाव के डूबने से 125 लोग बह गये। सरकारी आंकड़े कहीं कम हैं, भरोसेमंद नहीं हैं। गाँव की नदी में नाव डूबती है तो सरकार नाव की क्षमतानुसार जनहानि का अनुमान लगाती है। परंतु यह नजरअंदाज कर दिया जाता है कि नाव की क्षमता भले ही पचास लोगों की हो, उसमें डेढ़ सौ लोग चढ़ते हैं। यह गाँव की नाव है कोई हवाई जहाज नहीं कि आप यात्रियों की लिस्ट देखकर बता दें कि चूंकि इतने आदमी चढ़े थे इसलिये इतने लोग मरे हैं। बाढ़ प्रभावित जिले हैं-मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सहरसा, पूर्वी चंपारन, दरभंगा, पटना, सुपोल, भागलपुर, पश्चिमी चंपारन, शिवहर, नालंदा, कटिहार, गोपालगंज, मधेपुरा, अररिया, बेगूसराय, खगरिया।

नौकरशाह व अन्य सरकारी अफसर बाढ़ राहत का कार्यों में समुचित रूप से संलग्न नहीं हैं। हैलीकॉप्टर से राहत का कार्य में भी अनावश्यक देरी हुई है। पूरे बिहार में दो चार हैलीकॉप्टर ही लगा लगाये गये हैं। क्या यह गौतमगोस्वामी प्रकरण के बाद उपजा डर है? निश्चित रूप से है। गौतमगोस्वामी बाढ़ घोटाले प्रकरण का भूत नौकरशाहों पर हावी है। लगता है उन्होंने तय कर लिया था कि राहत कार्य में इस बार नहीं उलझना है। परंतु यह बहुत ही खराब उदाहरण है। होना यह चाहिये था कि वे मॉनीटरिंग सख्त करते, सरकारी फाइलों में ईमानदारी बरतते, ईमानदारी से पैसा खर्च करते, लेकिन उन्होंने तो हाथ ही पीछे खींच लिये। घोटाले के डर से काम नहीं करना निहायत ही अमानवीय है व अपनी नौकरी के साथ दगा भी है। आज लोग डूब रहे हैं। राहत, भोजन, दवा के अभाव में मर रहे हैं। उप मुख्यमंत्री व वित्तमंत्री सुशील मोदी 1974 आंदोलन से निकले हैं। सुशील मोदी हमारे मित्र हैं व मानवीय दृष्टि रखने वाले अच्छे नेता हैं। इनकी काफी ईमानदार छवि है। परंतु न जाने क्यों राहत कार्य शुरु करने में इतनी देर हुई है। मुझे बड़ा अफसोस है, उन्हें गाँवों में जाकर लोगों से बात करनी चाहिये थी। मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में सुशील मोदी के पास सभी अधिकार थे। परंतु आपदा प्रबंधन विभाग मुख्यमंत्री के पास था,इसलिये जब वे लौटे, हरी झंडी दी तब जाकर राहत कार्य शुरु हो पाया। हैलीकॉप्टर न चलाना तो शायद ये लोग पहले से ही तय कर चुके थे। वो तो विरोधियों ने मुद्दा उठाया तब कुछ बात बनी। प्रश्न यह है कि हैलीकॉप्टर से राहत कार्य एक हफ्ते के बाद क्यों शुरु हुआ जबकि सरकार कह रही थी कि हैलीकॉप्टर गोरखपुर में एकदम तैयार है। घोटाले के डर से हैलीकॉप्टर से राहत कार्य बहुत देर में जाकर शुरु हो पाया। जबकि बहुत सारे इलाके ऐसे हैं जहाँ बिना हैलीकॉप्टर के राहत पहुँच ही नहीं सकती।

राहत कार्य में देरी की एक वजह क्या राज्य की राजनीति में आंतरिक रस्साकशी भी है?

मैं तो यह नहीं मानता। मैं मानता हूं कि इस देश को जो नौकरशाह चला रहे हैं, यह सब उनकी मनमानी है। इनको पूरी छूट मिली हुई है, इसलिये ये अपनी मर्जी के अनुसार काम करते हैं। इनके बंगलों में तो पानी जा नहीं रहा है, इसलिये इनको कोई चिंता है नहीं। कुछ गैरजिम्मेदार आईएएस अफसरों को कम से कम पंद्रह दिनों के लिये बाढ़ प्रभावित इलाकों में भेजा जाना चाहिये। जॉर्ज फर्नानिंडस ने रक्षा मंत्री बतौर अपने कार्यकाल के दौरान ऐसे अफसरों को सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात कर दिया था।

नीतिश कुमार मॉरी मॉरीशस में थे जबकि बिहार बाढ़ में डूब रहा था। क्या यह अच्छे नेता की निशानी है? मुझे बड़ा ही अफसोस है कि नीतिशजी जैसे समझदार व्यक्ति स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ सके। बाहर जाना टाला जा सकता था,पहले बिहार की बाढ़ पर ध्यान देना चाहिये था। उन्होंने विरोधियों को ोलने का भी मौका दिया व नौकरशाहों को खुला खेलने का भी अवसर दे दिया।

बाढ़ में स्टंटबाजियाँ भी देखने को मिल रहीं हैं। लालू प्रसाद हाईवे पर हैलीकॉप्टर उतार देते हैं। मुझे लगता है इसे अनावश्यक रुप से राजनैतिक मुद्दा बनाया जा रहा है। यद्यपि कानूनन हैलीकॉप्टर हाईवे पर उतारना नहीं चाहिये था। पंरतु अगर उतर भी गया है तो यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं है कि इस पर चर्चा कर समय बरबाद किया जाये। बाढ़ में कैसे राहत दी जाये,इस पर काम करना चाहिये।

इस संदर्भ में स्वयंसेवी संगठनों का काम आप किस तरह दे देखते हैं? स्वंयसेवी संगठन अच्छा काम रहे हैं। लगभग 30000 एनजीओ बिहार में पंजीकृत हैं। परंतु सिर्फ 100 ही विश्वसनीय हैं, अच्छा काम कर रहे हैं। सौ एनजीओ व लगभग पच्चीस अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें इतने बड़े बिहार की बाढ़ समस्या पर कैसे काबू पा सकते हैं। यहाँ भी अगर सरकार समुचित सहयोग करे तो स्थिति काफी संभल सकती है। कल पटना में रेडियो मिर्ची पर मेरा साक्षात्कार प्रसारित हुआ था। मैंने विनम्र निवेदन किया था कि बाढ़ पीढ़ित जिलों के सभी खंडों में जो भी सहायता पहुंच रही है, उन सभी का उल्लेख आपदा प्रबंधन की “वैबसाइट” पर किया जाये। इससे फायदा यह होगा कि इन सभी जिलों व खंडों में कार्यरत एनजीओ वहाँ के सरकारी कर्मचारियों से मिलकर तुरंत देख लेंगे कि उपयुक्त संसाधन वहां पहुँचे हैं या नहीं। यह घोटाले पर काबू पाने में मदद करेगा व राहत सामग्री को सही जगह पहुँचाने में भी मदद करेगा। मैंने यह भी निवेदन किया था कि बिहार में आने वाली बाढ़ संबंधित विदेशी सहायता की जानकारी भी आपदा प्रबंधन की वैबसाइट पर आनी चाहिये। इससे सभी एनजीओ के बीच सांमजस्य बढ़ेगा, सरकार पर भी निगरानी रहेगी और राहत कार्य सुचारु हो सकेगा। मैंने बिहार व अन्य राज्यों के एनजीओ समुदाय व सामाजिक कार्यकर्ताओं से इस कठिन समय में आगे आकर मदद करने की अपील की थी। बिहार का मुख्यमंत्री भवन राहत कार्य देख रहा है। परंतु विश्वस्त सूत्र बताते हैं सरकार ने तथ्यों को उघाड़ने वाली,सरकार की आलोचना करने वाली ईमानदार संस्थाओं की मदद न करने के सख्त आदेश दे दिये हैं।

बाढ़ प्रभावित लोगों की त्वरित व दूरगामी जरूरतें क्या हैं?

सबसे पहले तो उनको सिर पर छत, दवाई व जिंदा रहने के लिये भोजन चाहिये। रोजमर्रा की वस्तु वस्तुएं यथा दियासलाई, मोमबत्ती चाहिये। बाढ़ के दिनों में सर्पदंश की घटनायें बहुत बढ़ जातीं हैं, सांप काटे की दवा अधिक मात्रा में चाहिये। बाढ़ पीढ़ित लोगों की दूरगामी जरूरतों में सबसे पहले स्थायी आवास है। उनके घर नष्ट हो गये हैं, काम के साधन नहीं रहे हैं। पानी उतरने के बाद उन्हें काम के बदले अनाज इत्यादि का कार्यक्रमों से लाभान्वित कराना चाहिये। सरकार को बाढ़ समस्या के दीर्घकालीन समाधान पर विमर्श करना चाहिये।

बिहार में लगभग हर साल बाढ़ आती है। आखिर क्यों उचित तरीके से इस पर काम नहीं हो पाया है जिससे बाढ़ से निपटा जा सके सके?

राजनैतिक वर्ग ने कभी भी इस मसले पर मंथन नहीं किया है कि तटबंध टूटने की समस्या पर कैसे काबू पाया जाये। बाढ़ राहत के क्या विकल्प हो सकते हैं, इस पर विचार ही नहीं हुआ है। सरकार को बाढ़ नीति बनानी चाहिये व इससे संबंधित विमर्श में बाढ़ प्रभावित व्यक्ति, शोधकर्ता, चिंतक, नीति निर्माता, सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकारों को शामिल करना चाहिये। जरा नर्मदा से तुलना कीजिये। बाढ़ नर्मदा में भी आती है। वहाँ नुकसान बहुत कम है लेकिन चूँकि वहाँ तीन राज्यों की बात आ जाती है, इसलिये अगर कोई छींकता भी है तो तीनों राज्यों के लोग बयान देने लग जाते हैं।

आप 1974 के जेपी आंदोलन से जुड़े रहे हैं। आपके अनुसार पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में बिहार की प्रशासन व्यवस्था किस तरह परिवर्तित हुई है?

लालूजी के कार्यकाल में सामाजिक जागरुकता आयी थी। उनका एक विजन है। उन्होंने नौकरशाहों की तानाशाही को भी तोड़ा। लाल बत्ती में घूमने वालों को बस की सवारी भी करवाई। आम जनता के साथ भी जुड़े। परंतु पाँच साल के बाद शासन व्यवस्था खराब होने लगी। अब पंद्रह साल के बाद नीतिशजी के कार्यकाल में सुशासन शुरु हुआ है। सरकार ने काफी प्रयास भी किये हैं, परंतु बड़ा अफसोस है कि बाढ़ जैसे बड़े मसले पर सरकार ने उपेक्षा बरती है। अगर सरकार सजग रही होती तो इतनी बड़ी हानि नहीं होती।

आप देशवासियों से क्या अपील करना चाहेंगे?

रातों रात तो बाढ़ की समस्या खत्म नहीं की जा सकती। इसमें पाँच दस साल लगेंगे। 1954 से लेकर आज तक की बाढ़ स्थिति का मूल्यांकन करना चाहिये कि आज तक कितनी जन हानि हुई,कितने गाँव डूबे,कितनी संपत्ति तबाह हुई। इस आधार पर रणनीति बनायी जानी चाहिये। दिल्ली में भी एक समूह बनना चाहिये, जो बाढ़ पर योजना बनाते समय ग्लोबल वार्मिंग जैसे मसलों को भी ध्यान में रखे। मैं यह भी अपील करूंगा कि अन्य राज्यों के लोग स्वयंसेवा करने बिहार आयें व हाथ बटायें। कई स्वयंसेवक आ भी रहे हैं। चेन्नई के डॉक्टरों ने उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में गये हैं। स्विस रैड क्रॉस एसएसवीके के साथ दरभंगा के सबसे अधिक प्रभावित इलाके घनश्यामपुर में कार्यरत है। अन्य प्रदेशों से भी अगर इसी तरह डॉक्टर आते हैं बाढ़ पीढ़ित लोगों को बड़ी राहत मिलेगी। बाढ़ की वजह से कई बीमारियाँ फैल रहीं हैं व समुचित चिकित्सा का अभाव है। पूरे देश को इस विपत्ति के समय बिहार की मदद के लिये आगे आना चाहिये। हमारी संस्था एसएसवीके उन्हें समुचित सहयोग देगी।

एसएसवीके के बाढ़ नियंत्रण संबंधी क्या प्रयास रहे हैं?

हमने बाढ़ से पूर्ण मुक्ति के लिये ''नदी मुक्ति आंदोलन'' शुरु किया है, परंतु राजनेता व तटबंध ठेकेदारों द्वारा निरंतर रोढ़े डाले जाने की वजह से यह बहुत अधिक सफल नहीं हो पाया है। नदी मुक्ति आंदोलन सभी तटबंधों को हटाने व नदी को 1954 पूर्व की अवस्था पर लाने की माँग करता है। हम शोधकर्ता, नीति निर्माता व सरकार को इस मुद्दे से अवगत कराते हैं और आम जनता को शिक्षित करते हैं कि तटबंध बाढ़ समस्या का समाधान नहीं, असली समाधान नदी को तटबंध से मुक्त करने में है।

2.5 एकड़ जमीन से दस-बारह लाख रु. की सालाना आमदनी!

2.5 एकड़ जमीन से दस-बारह लाख रु. की सालाना आमदनी!

वेब/संगठन: 

Author: 
विनय कुमार
हरियाणा के सोनीपत जिले का अकबरपुर बरोटा गांव। यहां आने के पहले आपके मस्तिष्क में गांव और खेती का कोई और चित्र भले ही हो, परंतु यहां आते ही खेत, खेती एवं किसान के बारे में आपकी धारणा पूरी तरह बदल जाएगी। इस गांव में स्थित है श्री रमेश डागर का माडल कृषि फार्म जो उनके अथक प्रयासों एवं प्रयोगधर्मिता की कहानी खुद सुनाता प्रतीत होता है। उनकी किसानी के कई ऐसे पहलू हैं, जिनके बारे में आम किसान सोचता ही नहीं। आइए जानते हैं, ऐसे कुछ पहलुओं के बारे में उन्हीं के शब्दों में…

प्रश्न : रमेशजी आज आप हर दृष्टि से एक सफल किसान हैं। हम आपके शुरुआती दिनों के बारे में जानना चाहेंगे।

रमेश डागर : बात सन् 1970 की है, घर की परिस्थितियों के कारण मुझे मैट्रिक स्तर पर ही पढ़ाई छोड़कर खेती में लगना पड़ा। तब मेरे पास केवल 16 एकड़ जमीन थी। शुरू में मैं भी वैसे ही खेती करता था जैसे बाकी लोग किया करते थे। मैंने पहले-पहले बाजरे की फसल लगाई थी, फसल अच्छी हुई, लाभ भी हुआ। फिर गेहूं की फसल लगाई, जिसमें खर-पतवार इतना अधिक हो गया कि नुकसान उठाना पड़ा। कुल मिलाकर मैं खेती के अपने तरीके से संतुष्ट नहीं था, इसलिए मैं कुछ अलग करना चाहता था, ताकि मैं भी समृध्दि के रास्ते पर आगे बढ़ सकूं। अंत में मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुझे अपने तौर-तरीके में बदलाव लाना होगा।

प्रश्न : आपने अपने तौर-तरीकों में क्या बदलाव किए और उनका क्या परिणाम निकला?

रमेश डागर : मैंने महसूस किया कि किसानों को फसलों के चयन में समझ-बूझ के साथ काम लेना चाहिए। मैं प्राय: कुछ किसानों को ट्रेन से सब्जी ले जाते हुए देखता था और उनसे रोज की बिक्री के बारे में पूछता था। उनसे मिली जानकारी ने मुझे सब्जी की खेती करने की प्रेरणा दी। सन् 1970 में मैंने पहली बार टिन्डे की फसल लगाई, जिसमें मुझे बाजरे और गेहूं से तीन गुना ज्यादा आमदनी हुई। सब्जीमंडी में मैंने एक बार कुछ ऐसी सब्जियां देखीं जो हमारे देश में नहीं बल्कि विदेशों में पैदा होती हैं। इनका भाव भी बहुत अधिक था। इनके बारे में मैंने कई स्रोतों से जानकारी इकट्ठी की और फिर सन् 1980 में उनकी खेती शुरू कर दी। सब्जियों की खेती से मेरी आमदनी काफी बढ़ गई।
इसी दौरान बाजार में फूलों की विशेष मांग को देखते हुए प्रयोग के तौर पर मैंने फूलों की भी खेती शुरू की, जिससे मुझे सबसे ज्यादा आमदनी हुई। सन् 1987-88में मैंने बेबीकार्न की खेती की। उस समय इसकी कीमत 400-500 रुपए प्रति किलो होने के कारण मुझे काफी लाभ हुआ। आज केवल सोनीपत जिले में ही बेबीकार्न की खेती 1600 एकड़ में हो रही है। फूल और सब्जियों की खेती से हुई आमदनी से मैंने सुख-समृध्दि के साधनों के साथ-साथ और खेत भी खरीदे। मेरे पास आज 122 एकड़ जमीन है।

प्रश्न : फसलों के चयन में सावधानी के साथ-साथ क्या आपने खेती के तौर-तरीकों में भी बदलाव किए हैं?

रमेश डागर :
हां किए हैं। मैं अपने खेतों में रासायनिक खाद (उर्वरक) का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करता। खाद के तौर पर मैं केंचुआ खाद व गोबर खाद का ही इस्तेमाल करता हूं। तथाकथित हरित क्रांति के नाम पर किसानों को जिस तरह से रासायनिक खाद का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, मुझे उस पर सख्त एतराज है।

प्रश्न : आपके राज्य में तो हरित क्रांति बहुत सफल रही है। यहां के किसानों ने काफी प्रगति भी की है। आप इससे असंतुष्ट क्यों हैं?

रमेश डागर :
पहली बार जब मैंने अपने खेत की मिट्टी की जांच करवाई तो पता चला कि रासायनिक खाद के इस्तेमाल का जमीन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि रासायनिक खाद का इसी तरह इस्तेमाल होता रहा तो आने वाले 50-60 वर्षों में हमारी जमीनें बंजर हो जाएंगी। आर्थिक रूप से भी रासायनिक खाद का इस्तेमाल किसान के हित में नहीं रहा। हरित क्रांति से किसानों के खर्चे तो बढ़ गए पर आमदनी कम होती गई। जहां पहले एक कट्ठे यूरिया से काम चल जाता था, वहीं आज पांच कट्ठा लगता है। इससे किसान कर्जदार होता जा रहा है।

प्रश्न : हरित क्रांति के नाम पर होने वाली इस क्षति को रोकने के लिए आपने क्या पहल की?

रमेश डागर :
जमीन की उर्वरता बनाए रखने के लिए मैंने कई प्रयोग किए और किसान-क्लब बना कर अन्य किसान भाइयों से भी विचार-विमर्श किया। हमने पाया कि खेती की अपनी पुरानी पध्दति को विज्ञान के साथ जोड़कर एक नया रास्ता ढूंढा जा सकता है। और यह रास्ता हमने जैविक कृषि के रूप में विकसित कर लिया है।

प्रश्न : आप एक प्रयोगधर्मी किसान हैं। आपने लीक से हटकर कई ऐसे सफल प्रयोग किए हैं, जिनसे भारत का किसान प्रेरणा ले सकता है। हम आपके ऐसे कुछ प्रयोगों के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे।

रमेश डागर :
जैविक आधार पर की जाने वाली बहुआयामी खेती में ही मेरी सफलता का राज छिपा है। किस मौसम में कौन सी फसल की खेती करनी है, यह तय करने के पहले मैं जमीन की गुणवत्ता और पानी की उपलब्धता के साथ-साथ बाजार की मांग को भी हमेशा ध्यान में रखता हूं। मैं जिस तरह से खेती करता हूं, उसके कुछ खास पहलू इस प्रकार हैं :

केंचुआ खाद :

केंचुआ किसान के सबसे अच्छे मित्रें में से एक है। मैं अपने खेतों में केंचुआ खाद का खूब प्रयोग करता हूं। एक किलो केंचुआ वर्ष भर में 50-60 किलो केंचुआ पैदा कर सकता है। केंचुआ खाद बनाने में खेती के सारे बेकार पदार्थों, जैसे डंठल, सड़ी घास, भूसा, गोबर, चारा आदि का प्रयोग हो जाता है। सब मिलाकर केंचुए से 60-70 दिनों में खाद तैयार हो जाती है। इस खाद की प्रति एकड़ खपत यूरिया की अपेक्षा एक चौथाई है। इसके प्रयोग से मिट्टी को नुकसान भी नहीं पहुंचता है। फसल की उत्पादकता भी 20-30 प्रतिशत बढ़ जाती है। केंचुआ खाद बनाने पर यदि किसान ध्यान दें तो वे अपने खेतों में प्रयोग करने के बाद इसे बेच भी सकते हैं। यह किसान भाईयों के लिए आमदनी का एक अतिरिक्त स्रोत भी हो सकता है।

बायो गैस :

मैं बायोगैस का इतना अधिक उत्पादन कर लेता हूं कि इससे इंजन चलाने और अन्य जरूरतें पूरी करने के बाद भी गैस बच जाती है। बची हुई गैस मैं अपने मजदूरों में बांट देता हूं। इससे उनके भी ईंधन का काम चल जाता है। बायोगैस का मैंने एक परिवर्तित माडल तैयार किया है जिसमें प्रति घन मीटर की लागत 5000 रुपए की बजाय 1000 रफपए हो जाती है। मेरे इस माडल में गैस पलांट की मरम्मत का खर्चा भी न के बराबर है।

मशरूम खेती :

मैं मशरूम की कई फसलें लेता हूं। जिन किसान भाइयों के यहां मार्केट नजदीक नहीं है, उन्हें डिंगरी (ड्राई मशरूम) की फसल लेनी चाहिए। आज पूरी दुनिया में डिंगरी का 80 हजार करोड़ का बाजार है। जहां धान की फसल होती है, वहां इसकी खेती की संभावनाएं सबसे अधिक होती हैं क्योंकि इसकी खेती में पुआल का विशेष रूप से प्रयोग होता है। फसल लेने के बाद बेकार बचे हुए पदार्थों को मैं केंचुआ खाद में बदल कर 60-70 दिनों में वापस खेतों में पहुंचा देता हूं।

तालाब एवं मछली पालन :

खेत के सबसे नीचे कोने को और गहरा करके मैंने तालाब बना दिया है, जिसमें बरसात का सारा पानी इकट्ठा होता है और डेरी का सारा व्यर्थ पानी भी चला जाता है। डेरी के पानी में मिला गोबर आदि मछलियों का भोजन बन जाता है। इससे उनका विकास दोगुना हो जाता है। मछलीपालन के अलावा तालाब में कमल ककड़ी, मखाना आदि भी उगाता हूं।

बहुफसलीय खेती :

मैं एक साथ तीन से चार फसल लेता हूं। ऐसा करते समय मैं समय, तापमान और मेल का विशेष ध्यान रखता हूं। उदाहरण स्वरूप सितंबर माह के अंत में मूली की बुवाई हो जाती है जिसके साथ गेंदा फूल भी लगा देते हैं। मूली को अक्टूबर में निकाल लेते हैं और नवंबर के शुरूआत में पालक या तोरी आदि लगा देते हैं जिसकी कटाई दिसंबर में हो जाती है। वहीं फूलों से आमदनी जनवरी से शुरू हो जाती है।

गुलाब एवं स्टीवीया :

स्टीवीया एक छोटा सा पौधा है जिससे निकलने वाला रस चीनी से 300 गुना ज्यादा मीठा होता है। इसका प्रयोग मधुमेह के मरीज भी कर सकते हैं। मैंने इसकी खेती से प्रति एकड़ लाखों रुपए की कमाई की है। एक विशेष प्रकार के महारानी प्रजाति के गुलाब की खेती से भी मैंने काफी लाभ कमाया है। इस गुलाब से निकलने वाले तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 4 लाख रुपए प्रति लीटर है। एक एकड़ में उत्पादित गुलाब से लगभग 800 ग्राम तेल निकाला जा सकता है।

केले की खेती :

केले की खेती से जमीन में केंचुओं की संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है। केला एक ऐसा पौधा है जो खराब एवं पथरीली जमीन को भी कोमल मिट्टी में तब्दील कर देता है। इसके प्रभाव से किसी भी फसल की उत्पादकता 25 से 30 प्रतिशत बढ़ जाती है। केले की जैविक खेती करने से पौधे सामान्य से ज्यादा ऊंचाई के होते हैं। इसकी खेती से लगभग 25 से 30 हजार रुपए प्रति एकड़ की आमदनी हो जाती है। गर्मी में केलों के बीच में ठंडक रहती है इसलिए इसमें फूलों की भी खेती हो जाती है, जिससे 15-20 हजार रुपए की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। गर्मी के दिनों में मधुमक्खी के बक्सों को रखने के लिए भी यह सबसे सुरक्षित स्थान होता है।

वृक्षारोपण :

खेतों की मेड़ों पर मैंने पापुलर आदि के पेड़ लगा रखे हैं जिससे 7 से 8 वर्षों में प्रति एकड़ 70 से 80 हजार रुपए की आमदनी हो जाती है। इन वृक्षों से खेतों को नुकसान भी नहीं होता और पर्यावरण भी ठीक रहता है।

मधुमक्खी पालन :

मधुमक्खी से भरे एक बक्से की कीमत लगभग चार हजार रुपए होती है। मेरी खेती में मधुमक्खियों की विशेष भूमिका है। वैसे भूमिहीन किसान भाइयों के लिए भी मधुमक्खी पालन एक अच्छा काम है। शहद उत्पादन के अलावा भी इनके कई फायदे हैं। फूलों की पैदावार में इनसे 30 से 40 प्रतिशत और तिलहन-दलहन की पैदावार में लगभग 10 से 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो जाती है। बेहतर परागण के कारण फसलें भी एक ही समय पर पकती हैं। इस क्षेत्र में खादी ग्रामोद्योग एवं कई अन्य संस्थाएं सहायता कर रही हैं।

प्रश्न : आपने एक माडल तैयार किया है जिसमें सिर्फ 2.5 एकड़ जमीन से दस-बारह लाख रुपए प्रतिवर्ष की आमदनी हो सकती है और साथ ही कई लोगों को रोजगार भी मिल जाता है। इस बारे में जरा विस्तार से बताएं।

रमेश डागर :
मैंने 2.5 एकड़ में छ: परियोजनाएं चला रखी हैं जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है :

मधुमक्खी पालन :

मधुमक्खियों के 150 बक्सों से हम शुरुआत करते हैं। एक ही साल में इनकी संख्या दोगुनी हो जाती है। इससे साल में 5-6 लाख की आमदनी हो जाती है।

केंचुआ खाद:

इसे बेचकर मैं 3-4 लाख रुपए की आमदनी कर लेता हूं।

मशरूम खेती:

इससे मुझे प्रतिवर्ष 3-4 लाख रुपए मिल जाते हैं।

डेरी:

एक छोटी सी डेरी से लगभग 60-70 हजार की सीधी आय होती है।

मछली पालन :

इससे भी लगभग 15-20 हजार रुपए मिल जाते हैं।

ग्रीन हाउस :

इसमें लगी फसल से एक-डेढ़ लाख रुपए आ जाते हैं।

प्रश्न : आप किसान भाइयों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

रमेश डागर :
समझदार किसान तो वो है जो पहले मार्केट देखे, फिर मिट्टी की जांच कराए, तापमान का ख्याल रखे और अच्छे बीज का चयन करे। किसान भाइयों को जैविक खेती ही करनी चाहिए, मवेशी रखनी चाहिए, बायोगैस तथा वर्मी कम्पोस्ट तैयार करना चाहिए। 365 दिन में 300 दिन कैसे काम करें, प्रत्येक किसान को इसकी चिन्ता करनी चाहिए। हमें एक-दो फसलें ही नहीं बल्कि एक-दूसरे पर आश्रित खेती की बहुआयामी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। इस संबंध में किसी प्रकार की जानकारी के लिए किसान मुझसे जब चाहें संपर्क कर सकते हैं।
मेरा पता है :
डागर कृषि फार्म, ग्राम व पोस्ट – अकबरपुर बरोटा,
जिला-सोनीपत, हरियाणा, पिन-131003